रायपुर, 13 अप्रैल। Didi ke Bakhri उत्तर बस्तर कांकेर जिले में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में “दीदी के बखरी” पहल एक प्रभावशाली मॉडल बनकर उभरी है। बिहान योजना के अंतर्गत संचालित इस पहल ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में व्यापक बदलाव लाया है। अब महिलाएं केवल पारंपरिक खेती तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाकर अपनी आय बढ़ाने के साथ-साथ पोषण और स्वास्थ्य में भी सुधार ला रही हैं।
एकीकृत कृषि से आय और पोषण दोनों में सुधार
इस पहल के तहत महिलाएं अपने घर के आसपास की बाड़ी, जिसे स्थानीय भाषा में बखरी कहा जाता है, में सब्जी-भाजी, फल और कंदमूल उगाकर न केवल अपने परिवार को ताजा और पौष्टिक भोजन उपलब्ध करा रही हैं, बल्कि बाजार में बिक्री कर अतिरिक्त आय भी अर्जित कर रही हैं। इसके साथ ही वे मछली पालन, मुर्गी पालन, बकरी पालन और वनोपज संग्रहण जैसी गतिविधियों को भी अपनाकर आय के विविध स्रोत विकसित कर रही हैं। यह एकीकृत मॉडल कम लागत में अधिक लाभ देने वाला साबित हो रहा है।
जिले के चार विकासखंडों में सफल संचालन
यह योजना जिले के नरहरपुर, कांकेर, भानुप्रतापपुर और चारामा विकासखंडों में संचालित की जा रही है। वर्तमान में कुल 3364 महिलाएं इस पहल से जुड़कर विभिन्न आजीविका गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है और आगामी वित्त वर्ष 2026-27 में 10,780 महिलाओं को इससे जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे अधिक से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
आर्थिक सशक्तिकरण की ओर मजबूत कदम
“दीदी के बखरी” योजना का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की औसत मासिक आय को 20 से 25 हजार रुपये तक पहुंचाना है। इससे महिलाएं अपने परिवार की जरूरतों को बेहतर ढंग से पूरा कर पा रही हैं और आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं। यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ महिलाओं में आत्मविश्वास भी बढ़ा रही है।
आजीविका सेवा केंद्र से मिल रहा सहयोग
महिलाओं को बेहतर संसाधन उपलब्ध कराने के लिए क्लस्टर स्तर पर आजीविका सेवा केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं, जिन्हें स्वयं महिलाएं संचालित करेंगी। इन केंद्रों के माध्यम से बीज, कृषि उपकरण और खाद जैसी आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे महिलाओं को अपने कार्यों को सुचारु रूप से संचालित करने में सहायता मिल रही है।
सफलता की प्रेरणादायक कहानियां
नरहरपुर विकासखंड के ग्राम रावस की सुरेखा नेताम ने अपने बखरी में उन्नत सब्जियों और मुर्गी पालन के माध्यम से आय बढ़ाने के साथ-साथ पोषण स्तर में भी सुधार किया है। उन्होंने बताया कि हरी पत्तेदार सब्जियां और फल एनीमिया जैसी समस्याओं को दूर करने में मददगार हैं। वहीं ग्राम ठेमा की नामिका यादव वनोपज संग्रहण और पशुपालन के जरिए अपनी आय में निरंतर वृद्धि कर रही हैं। भानुप्रतापपुर के ग्राम हाटकर्रा की मोतिन दर्रो ने मुर्गी और मछली पालन को एक साथ जोड़कर लागत कम और मुनाफा अधिक करने का सफल मॉडल अपनाया है। इसी प्रकार धनेली की जमुना कोर्राम आजीविका डबरी के माध्यम से आय अर्जित कर रही हैं और अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही हैं।
“दीदी के बखरी” पहल ने यह सिद्ध कर दिया है कि सही मार्गदर्शन, संसाधनों की उपलब्धता और सामूहिक प्रयासों से ग्रामीण महिलाएं भी आर्थिक रूप से सशक्त बन सकती हैं। यह योजना न केवल आय बढ़ाने का माध्यम है, बल्कि पोषण, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम भी है, जो आने वाले समय में और अधिक महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता रखती है।

