Inspiring Story : बंदूक के साए से विकास की राह तक…जब एक IPS ने बदल दी बस्तर की तकदीर…! बदलाव की पूरी कहानी यहां पढ़ें

Inspiring Story : बंदूक के साए से विकास की राह तक…जब एक IPS ने बदल दी बस्तर की तकदीर…! बदलाव की पूरी कहानी यहां पढ़ें

डेस्क रिपोर्ट, 31 मार्च। Inspiring Story : छत्तीसगढ़ की धरती ने दशकों तक नक्सलवाद के आतंक को झेला है। विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में, गोलियों की गूंज, दहशत और सन्नाटा ही यहां की पहचान बन गए थे। फिर भी, हर अंधकारमय दौर में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जिनमें घटनाओं का रुख बदलने का साहस होता है। छत्तीसगढ़ की इस लंबी लड़ाई में, ऐसा ही एक नाम सबसे अलग उभरकर सामने आता है, शिव राम प्रसाद कल्लूरी यानी आईपीएस एसआरपी कल्लूरी।

एक अफसर, जिसने डर को चुनौती दी

साल 1994 बैच के आईपीएस अधिकारी एसआरपी कल्लूरी ने जब वर्दी पहनी, तब शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि उनका नाम एक दिन नक्सल विरोधी अभियानों की पहचान बन जाएगा। मूलतः आंध्रप्रदेश से आने वाले इस अफसर ने छत्तीसगढ़ को अपना कार्यक्षेत्र चुना और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कोरबा, बिलासपुर, दंतेवाड़ा से लेकर बलरामपुर तक, जहां-जहां वे तैनात हुए, वहां नक्सलियों के खिलाफ सख्त और रणनीतिक कार्रवाई शुरू हुई।

बलरामपुर: जहां बदली कहानी

बलरामपुर-रामानुजगंज कभी नक्सलियों का मजबूत गढ़ माना जाता था। 2004 में एसपी के रूप में तैनात कल्लूरी ने यहां आक्रामक अभियान शुरू किया। नतीजा- 10 साल के भीतर ही यह इलाका लगभग नक्सल मुक्त हो गया। यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं था, बल्कि यह विश्वास जीतने और भय खत्म करने की शुरुआत थी।

बस्तर में ‘घर में घुसकर’ लड़ाई

2014 में, जब कल्लूड़ी को बस्तर का इंस्पेक्टर जनरल (IG) नियुक्त किया गया, तो उन्होंने ठीक वही रणनीति अपनाई, लड़ाई को सीधे जंगलों में ले जाना। सुरक्षा बलों, STF और स्थानीय पुलिस के साथ तालमेल बिठाकर काम करते हुए, उन्होंने नक्सल नेटवर्क को खत्म करना शुरू कर दिया।

उनके कार्यकाल के दौरान, 1,200 से ज़्यादा नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, और 40 से ज़्यादा मुठभेड़ें हुईं। नक्सलियों के लिए, उनका नाम आतंक का पर्याय बन गया था।

चुनौतियां और विवाद

हर बड़ी लड़ाई के साथ विवाद भी जुड़े होते हैं। कई मुठभेड़ों को फर्जी बताया गया, राजनीतिक दबाव बढ़ा, और मानवाधिकार के सवाल उठे। आखिरकार हालात ऐसे बने कि कल्लूरी को बस्तर से हटाना पड़ा। लेकिन एक सच्चाई यह भी रही कि उनके कार्यकाल में नक्सली लगातार पीछे हटते रहे।

रेड कॉरिडोर का टूटा सपना

नक्सलियों का सपना आंध्र प्रदेश से लेकर नेपाल तक एक मज़बूत ‘रेड कॉरिडोर’ स्थापित करना था। लेकिन, सरगुजा और बलरामपुर में चलाए गए अभियानों ने इस योजना को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया।

नेतृत्व, रणनीति और विश्वास

नक्सलवाद के खिलाफ यह लड़ाई सिर्फ़ गोलियों के दम पर नहीं जीती गई। इसे स्थानीय लोगों का भरोसा जीतकर, हर गांव तक विकास पहुंचाकर और मज़बूत नेतृत्व के ज़रिए जीता गया। आज, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नक्सलवाद के खात्मे का ऐलान कर रहे हैं, तो इस घोषणा के पीछे सालों की कड़ी मेहनत, बलिदान और रणनीति की कई परतें छिपी हुई हैं।

दृढ़ इच्छाशक्ति ला सकती है बदलाव

IPS एसआरपी कल्लूरी की कहानी हमें सिखाती है कि, कठिन हालात में भी दृढ़ इच्छाशक्ति बदलाव ला सकती है। सही नेतृत्व और स्पष्ट लक्ष्य से असंभव भी संभव हो जाता है और सबसे बड़ी बात, डर को खत्म करने के लिए पहले खुद निडर बनना पड़ता है।

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई सिर्फ एक प्रशासनिक या सैन्य अभियान नहीं थी, यह विश्वास, साहस और निरंतरता की कहानी है। और इस कहानी में एसआरपी कल्लूरी जैसे अधिकारी हमेशा एक प्रेरणा के रूप में याद किए जाएंगे, जिन्होंने दिखाया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो सबसे कठिन जंग भी जीती जा सकती है।

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