Tulsi Gabbard
हाल ही में अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस डायरेक्टर तुलसी गबार्ड ने एक चौंकाने वाला बयान दिया, जिसने न सिर्फ अमेरिका बल्कि भारत में भी राजनीतिक हलचल मचा दी। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) को आसानी से हैक किया जा सकता है और इनके ज़रिए चुनावी नतीजों में हेरफेर संभव है। ये बयान उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मौजूदगी में दिया, और जैसे ही यह बात बाहर आई, सोशल मीडिया पर तूफान आ गया।
इस बयान के बाद अमेरिका में चुनावों की पारदर्शिता पर बहस छिड़ गई। तुलसी ने ये भी कहा कि अब समय आ गया है जब अमेरिका को दोबारा पेपर बैलट सिस्टम अपनाना चाहिए, ताकि लोगों को भरोसा हो सके कि उनका वोट सही जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क भी पहले अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि हमें EVM सिस्टम को खत्म कर देना चाहिए।
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जब ये बयान भारत में पहुंचा, तो यहां भी राजनीति गर्मा गई। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने सोशल मीडिया पर सीधा सवाल दागा कि भारत का चुनाव आयोग और केंद्र सरकार तुलसी गबार्ड की टिप्पणी पर चुप क्यों हैं। उन्होंने पूछा कि जब अमेरिका जैसे देश की खुफिया प्रमुख EVM की सुरक्षा पर सवाल उठा रही हैं, तो क्या भारत को अपनी मशीनों की समीक्षा नहीं करनी चाहिए? उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से भी इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेने की अपील की।
लेकिन भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने इस पर जवाब देने में देर नहीं लगाई। आयोग ने साफ किया कि तुलसी गबार्ड की जो चिंता है, वो अमेरिका में इस्तेमाल हो रही वोटिंग मशीनों के लिए है — भारत की EVM उनसे बिल्कुल अलग हैं। आयोग ने बताया कि भारत में इस्तेमाल होने वाली EVM एकदम ऑफलाइन हैं, यानी इनका इंटरनेट, वाई-फाई या किसी नेटवर्क से कोई संबंध नहीं होता। जबकि अमेरिका की मशीनें अक्सर इंटरनेट से जुड़ी होती हैं, जिनमें ऑपरेटिंग सिस्टम भी होते हैं जैसे Windows या Linux। भारत की मशीनों में न तो ऐसा कोई सिस्टम होता है और न ही इनमें कोई बाहरी सॉफ्टवेयर अपलोड किया जा सकता है।
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ECI ने यह भी बताया कि भारत की हर वोटिंग मशीन में VVPAT (वोटर वेरीफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) सिस्टम जुड़ा होता है, जो हर वोट के साथ एक पर्ची निकालता है, जिससे मतदाता खुद देख सके कि उसका वोट सही गया है या नहीं। अब तक पांच करोड़ से ज्यादा VVPAT पर्चियों की गिनती की जा चुकी है और हर बार EVM के नतीजे से उनका मिलान सही पाया गया है।
चुनाव आयोग ने यह भी दोहराया कि भारत में EVM का डिजाइन और निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL) जैसी सरकारी एजेंसियों द्वारा किया जाता है, और पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता के साथ होती है। मतदान से पहले हर पोलिंग बूथ पर मॉक पोल होता है, जिसमें सभी दलों के पोलिंग एजेंट मौजूद रहते हैं। ये एजेंट खुद अपनी नजरों से देख सकते हैं कि मशीन ठीक तरह से काम कर रही है या नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में पहले ही अपनी राय दे दी है। 2002 में कोर्ट ने चुनाव आयोग की व्यवस्था को सही माना था और 2013 में यह आदेश दिया कि हर EVM के साथ VVPAT का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाए। 2025 में जब 100% VVPAT की गिनती की मांग की गई, तो कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और कहा कि अभी तक मशीनों की विश्वसनीयता पर कोई शक की गुंजाइश नहीं है।
इस पूरी बहस में जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आती है, वो ये है कि भारत की EVM तकनीकी रूप से अमेरिका और अन्य देशों से पूरी तरह अलग हैं। जहां अमेरिका की मशीनें इंटरनेट से जुड़ी और जटिल होती हैं, वहीं भारत की मशीनें बेहद साधारण, ऑफलाइन और प्रोग्रामिंग के बाद पूरी तरह लॉक कर दी जाती हैं। इसीलिए तुलसी गबार्ड की चिंता, भारत के लिए लागू नहीं होती।

