Bihar Politics : बिहार में कांग्रेस की नई चाल, ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा से चुनावी रण का बिगुल!

Bihar Politics : बिहार में कांग्रेस की नई चाल, ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा से चुनावी रण का बिगुल!

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पटना। बिहार की राजनीति में हलचल काफी तेज हो गई है। खबरों से मिली जानकारी के मुताबिक कांग्रेस ने 2025 विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ी रणनीति बनाई है। ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा। यह यात्रा 16 मार्च से पश्चिमी चंपारण के ऐतिहासिक भितिहरवा गांधी आश्रम से शुरू हो रही है और अगले 24 दिनों तक पूरे बिहार में घूमेगी, आखिर में पटना में इसका समापन होगा।

कन्हैया कुमार की ‘महत्वपूर्ण भूमिका’

हालांकि कांग्रेस ने अभी तक औपचारिक रूप से कन्हैया कुमार को इस यात्रा का नेता घोषित नहीं किया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक वे इस यात्रा में मुख्य चेहरा होंगे। बता दें कि कन्हैया बिहार की राजनीति में पहले से ही एक चर्चित चेहरा रहे हैं, और उनकी मौजूदगी हमेशा से महागठबंधन में हलचल मचाती रही है।

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कन्हैया के कांग्रेस में आने के बाद से राजद और खासकर तेजस्वी यादव के बीच एक अघोषित असहजता देखी जा रही है। अब जब कांग्रेस युवाओं के रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों पर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है, तो यह तेजस्वी यादव के एजेंडे से भी सीधी टक्कर है।

राहुल गांधी की दो बार यात्रा में भागीदारी

इस यात्रा की राजनीतिक अहमियत और भी बढ़ जाती है जब यह सामने आता है कि राहुल गांधी खुद दो बार इस यात्रा में शामिल हो सकते हैं। इससे यह साफ संकेत मिलते हैं कि कांग्रेस बिहार को लेकर इस बार पूरी तरह एक्टिव मोड में है।

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महागठबंधन में खिचड़ी या खलबली?

इस यात्रा के जरिए कांग्रेस महागठबंधन में अपनी राजनीतिक ताकत दिखाना चाहती है। माना जा रहा है कि कांग्रेस अब बिहार में ‘रेस वाले घोड़ों’ पर दांव लगाने की रणनीति बना चुकी है। यानी वो नेता, जो जनता के बीच लोकप्रिय हैं और चुनाव जितवा सकते हैं।

राबड़ी देवी का आवास फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है। राजद पूरी स्थिति को मॉनिटर कर रहा है, लेकिन खुलकर प्रतिक्रिया नहीं दे रहा।

क्यों खास है ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा?
  • बिहार में बेरोजगारी और पलायन सबसे बड़े चुनावी मुद्दे हैं।
  • इस यात्रा के जरिए कांग्रेस युवाओं को अपने पक्ष में करना चाहती है।
  • महागठबंधन में सीट शेयरिंग और लीडरशिप को लेकर होने वाली बातचीत पर इसका असर पड़ सकता है।

अब ऐसे में सवाल यह है, क्या कन्हैया कुमार कांग्रेस को बिहार में नई ताकत दिला पाएंगे? और क्या इस यात्रा से महागठबंधन में नए समीकरण बनेंगे या पुरानी दरारें और गहरी होंगी?

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