Badrinath kapat closing rituals
बद्रीनाथ धाम की दिव्यता और रहस्य से भरी परंपराएं हर भक्त को अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव देती हैं। चार धामों में से एक बद्रीनाथ धाम के कपाट साल में केवल छह माह के लिए ही खुलते हैं और सर्दियों में बंद कर दिए जाते हैं। लेकिन कपाट बंद करने से पहले यहां कुछ ऐसी रोचक और पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
कपाट बंद होने से पहले मंदिर को सैकड़ों कुंतल फूलों से सजाया जाता है और वैदिक मंत्रों के साथ विशेष पूजा-अर्चना होती है। भगवान बद्रीविशाल को कच्चे सूत से बने कम्बल में लपेटकर गाय के घी से उसे गीला किया जाता है। यह विशेष आवरण ठंड के छह महीनों के लिए उन्हें ओढ़ाया जाता है।
Badrinath kapat closing rituals
इस दौरान एक अनूठी परंपरा निभाई जाती है — मंदिर के मुख्य पुजारी देवी पार्वती का वेश धारण करते हैं और लक्ष्मी माता को भगवान विष्णु (बद्रीविशाल) के समीप विराजमान करते हैं। मान्यता है कि देवी लक्ष्मी को भगवान विष्णु के समीप इस अवधि में विराजने हेतु उनकी सखी देवी पार्वती ही स्थापित करती हैं।
इसके अलावा, गर्भगृह में एक अखंड दीप प्रज्ज्वलित किया जाता है, जो अगले छह महीने तक बिना बुझे जलता रहता है। कपाट बंद होने के बाद भगवान बद्रीविशाल की प्रतीकात्मक डोली को जोशीमठ स्थित नरसिंह मंदिर ले जाया जाता है, जहां पूरे शीतकाल में उनकी पूजा होती है।
और फिर, अगली यात्रा आरंभ होने पर इसी डोली के साथ भव्य शोभायात्रा के माध्यम से भगवान बद्रीविशाल को वापस बद्रीनाथ धाम लाया जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, अपितु संस्कृति, श्रद्धा और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम भी है।

