KITG 2026 : एशियन गेम्स पर नजर, ओलंपिक सपना भी कायम…कोमालिका बारी की संघर्षभरी तैयार

KITG 2026 : एशियन गेम्स पर नजर, ओलंपिक सपना भी कायम…कोमालिका बारी की संघर्षभरी तैयार

रायपुर, 31 मार्च। KITG 2026 : भारतीय तीरंदाजी की उभरती हुई खिलाड़ी कोमालिका बारी इन दिनों अपने करियर के अहम पड़ाव पर हैं, जहां उनका फोकस 2026 एशियन गेम्स में भारतीय टीम में जगह बनाना और आगे 2028 ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करना है। जूनियर स्तर पर विश्व कैडेट और विश्व जूनियर खिताब जीतकर पहचान बनाने वाली कोमालिका अब सीनियर स्तर की प्रतिस्पर्धा में खुद को स्थापित करने के लिए लगातार मेहनत कर रही हैं।

सीनियर स्तर पर चुनौती, लेकिन हौसले मजबूत

जूनियर स्तर की सफलता के बाद सीनियर सर्किट में कदम रखना कोमालिका के लिए आसान नहीं रहा। कड़ी प्रतिस्पर्धा और अनुभव की कमी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। वर्तमान में वे टॉप-16 खिलाड़ियों में शामिल हैं और राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर का हिस्सा बनकर अपनी दावेदारी मजबूत कर रही हैं। एशियन गेम्स के चयन को लेकर वे पूरी गंभीरता के साथ तैयारी कर रही हैं।

तकनीक के साथ मानसिक मजबूती पर भी फोकस

पुणे में चल रहे प्रशिक्षण शिविर में कोमालिका अपनी तकनीक को निखारने के साथ-साथ मानसिक रूप से मजबूत बनने पर विशेष ध्यान दे रही हैं। उनका मानना है कि बड़े टूर्नामेंट्स में दबाव को संभालना उतना ही जरूरी है जितना तकनीकी दक्षता। इसी कारण वे मानसिक प्रशिक्षण और मैच अनुभव दोनों पर बराबर ध्यान दे रही हैं।

संघर्षों से भरा रहा शुरुआती सफर

कोमालिका की कहानी संघर्ष और संकल्प का उदाहरण है। 12 साल की उम्र में उन्होंने तीरंदाजी शुरू की, जब उनके पास संसाधनों की कमी थी। शुरुआती दिनों में उन्होंने बांस से बने धनुष से अभ्यास किया। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन उनकी मां के समर्थन ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।

हर दिन 18 किलोमीटर का सफर, तब मिली सफलता की राह

टाटा आर्चरी अकादमी तक पहुंचने के लिए कोमालिका को रोजाना 18 किलोमीटर साइकिल चलानी पड़ती थी। कोच धर्मेंद्र तिवारी और पूर्णिमा महतो के मार्गदर्शन में उन्होंने अपने खेल को नई दिशा दी। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया।

ट्राइबल गेम्स में बनीं प्रेरणा का केंद्र

रायपुर में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में कोमालिका प्रमुख आकर्षण बनी हुई हैं। वे न केवल अपने प्रदर्शन से बल्कि अपनी प्रेरणादायक यात्रा से भी युवाओं को प्रभावित कर रही हैं। उनका मानना है कि यह मंच जनजातीय खिलाड़ियों के लिए बड़ा अवसर है। कोमालिका चाहती हैं कि अधिक से अधिक जनजातीय बच्चे तीरंदाजी जैसे खेलों को अपनाएं। वे मानती हैं कि सही मंच और मार्गदर्शन मिलने पर हर प्रतिभा आगे बढ़ सकती है। उनका सफर इसी सोच का जीवंत उदाहरण है।

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