डेस्क रिपोर्ट, 16 अगस्त। Freedom Struggle Special : आज हम आपको ले चलते हैं वीरता से भरी उन शामों में- जब 1858 की सर्द रात में रायपुर छावनी में लगी आग ने ब्रिटिश सरकार की नींद उड़ा दी थीहनुमान सिंह, उस समय के मैगजीन लश्कर के निर्भीक नेता और सिपाही थे। सार्जेंट-मेजर सिडवेल पर हमले ने क्रांतिकारी वीरता की ज्वाला प्रज्वलित कर दी। यह घटना महज एक हमला नहीं थी, यह एक चेतावनी थी कि भारतीय धरती अब ब्रिटिश अत्याचार को बर्दाश्त नहीं करेगी।
वीर नारायण सिंह की शहादत
10 दिसंबर 1857 को स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम शहीद वीर नारायण सिंह को रायपुर के जयस्तंभ चौक (सेंट्रल जेल के सामने) पर फांसी दी गई। यह घटना अंग्रेजों द्वारा छत्तीसगढ़ में विद्रोह को दबाने की साज़िश थी। इतिहासकारों के अनुसार, इस त्रासदी ने स्थानीय सैनिकों और देशभक्तों में विद्रोह की प्रेरणा जगाई और हनुमान सिंह जैसे वीर गढ़ने में प्रमुख भूमिका निभाई।
हनुमान सिंह का साहसिक विद्रोह
18 जनवरी 1858 की रात्रि, रायपुर की तृतीय रेगुलर रेजीमेंट (फौजी छावनी) में हनुमान सिंह — जो कि ‘मैगजीन लश्कर’ थे, ने सार्जेंट मेजर सिडवेल की हत्या कर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह भड़काया। उन्होंने पहले सिडवेल पर भयंकर तलवार वार किए, फिर छावनी में प्रवेश कर साथी सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रेरित किया। हालांकि अधिकांश सैनिक नहीं जुड़े, लेकिन उन्होंने छह से सात घंटे तक बहादुरी से अंग्रेजों से टक्कर दी।
शहीदों की शहादत और अंग्रेजों की क्रूरता
विद्रोह के दौरान हनुमान सिंह भागने में सफल रहे, लेकिन उनके 17 साथी अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। इन्हें 22 जनवरी 1858 को रायपुर सेंट्रल जेल के सामने खुलेआम फांसी दी गई। इन वीरों की सूची इस प्रकार है- गाजी खान (हवलदार), अब्दुल हयात, मुल्लू, शिवरी नारायण, पन्नालाल, मातादीन, ठाकुर सिंह, अकबर हुसैन, बली दुबे, लल्ला सिंह, बुद्धु, परमानंद, शोभाराम, दुर्गा प्रसाद, नाज़र मोहम्मद, शिव गोविंद, देवीदीन।
कहा जाता है कि फांसी से पहले सभी ने एक स्वर में वंदेमातरम और अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाए। उस समय रायपुर की हवा में देशभक्ति की गूंज फैल गई थी। अंग्रेज चाहते थे कि यह घटना लोगों में दहशत पैदा करे, लेकिन इसका उल्टा असर हुआ- यह घटना छत्तीसगढ़ के लोगों के दिल में आज़ादी के बीज और गहरे बो गई।
आज भी रायपुर की यह घटना छत्तीसगढ़ की स्वतंत्रता की लड़ाई के इतिहास में अमर बलिदान के रूप में दर्ज है। ये 17 नाम केवल शहीदों की सूची नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं—कि मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा मूल्य भी छोटा है।
प्रभाव और ऐतिहासिक महत्व
इस विद्रोह ने अंग्रेजों को भयभीत कर दिया, उन्होंने विद्रोही सैनिकों की संपत्ति ज़ब्त की और उनके परिजनों को प्रताड़ित किया, ताकि कोई और ऐसा साहस न दिखा सके। इतिहासकार आचार्य रमेन्द्रनाथ मिश्र के अनुसार — यह घटना, वीर नारायण सिंह की बलिदान की आग पर सफ़ल प्रतिक्रिया थी और छत्तीसगढ़ के लोगों की आज़ादी की चिंगारी को और मजबूत किया।
इस प्रकार, रायपुर का यह विद्रोह केवल स्थानिक घटना नहीं, बल्कि 1857–58 की क्रांति में उत्तर और मध्य भारत से उठने वाले व्यापक क्रांतिकारी स्वर का दूरगामी प्रभाव था। यदि आप चाहते हैं, तो मैं वीर नारायण सिंह के जीवन से जुड़े और अधिक विवरण या छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम के अन्य स्थानीये नायकों पर जानकारी भी प्रदान कर सकता हूँ।