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Durg Model बना देश के लिए मिसाल… 381 गांवों का कचरा अब बनेगा कमाई का साधन… ‘वेस्ट टू वेल्थ’ से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिली नई ताकत

The 'Durg Model' sets a precedent for the nation... Waste from 381 villages to become a source of income... 'Waste to Wealth' initiative gives new strength to the rural economy.

Durg Model

रायपुर/दुर्ग, 13 जून।  Durg Model : छत्तीसगढ़ का दुर्ग जिला स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत एक नई मिसाल कायम कर रहा है। जनपद पंचायत दुर्ग के ग्राम पंचायत कोलिहापुरी में स्थापित प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई को जिले के पहले आधिकारिक मटेरियल रिकवरी सेंटर (एमआरसी) के रूप में विकसित किया गया है। यह केंद्र केवल कचरा प्रबंधन का माध्यम नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण उद्यमिता और आर्थिक आत्मनिर्भरता का सफल मॉडल बनकर उभरा है। जिला प्रशासन की ‘वेस्ट टू वेल्थ’ पहल ने ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे को आय के स्रोत में बदलने की दिशा में नई राह दिखाई है।

तकनीक और जनभागीदारी से कचरा प्रबंधन बना लाभ का जरिया

कलेक्टर अभिजित सिंह ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि कोलिहापुरी एमआरसी की स्थापना का उद्देश्य कचरे के वैज्ञानिक निष्पादन के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल को साकार करना है। उन्होंने कहा कि यह केंद्र साबित करता है कि सही तकनीकी मार्गदर्शन और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से कचरा प्रबंधन को लाभदायक उद्यम में बदला जा सकता है। जिला प्रशासन इस मॉडल को पूरे जिले के लिए एक मानक के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है।

381 गांवों के प्लास्टिक कचरे का होगा वैज्ञानिक प्रबंधन

जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री बजरंग दुबे ने बताया कि कोलिहापुरी एमआरसी को जिले के स्वच्छता अभियान का नोडल सेंटर बनाया गया है। दुर्ग जनपद के सभी 81 ग्रामों के साथ-साथ धमधा और पाटन विकासखंड की इकाइयों को भी इससे जोड़ा गया है। इस एकीकृत व्यवस्था के माध्यम से जिले के कुल 381 गांवों में उत्पन्न प्लास्टिक कचरे को एकत्र कर वैज्ञानिक पद्धति से रिसाइकिल किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को नई मजबूती मिल रही है।

जीपीएस युक्त ई-रिक्शा से हो रही रियल टाइम मॉनिटरिंग

कचरा संग्रहण व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए जिला प्रशासन ने आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। जिला खनिज न्यास निधि (डीएमएफ) से चार अत्याधुनिक ई-रिक्शा उपलब्ध कराए गए हैं, जिनमें जीपीएस ट्रैकिंग प्रणाली लगी हुई है। यह प्रणाली सीधे कंट्रोल रूम से जुड़ी है और गांवों के सेग्रीगेशन शेड से प्लास्टिक कचरे के संग्रहण की रियल टाइम निगरानी की जा रही है। पूरी प्रक्रिया केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के पोर्टल पर पंजीकृत है, जिससे इसकी पारदर्शिता और वैज्ञानिकता सुनिश्चित होती है।

कचरे से कमाई, हर महीने हो रहा शुद्ध लाभ

कोलिहापुरी एमआरसी आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां प्रतिदिन लगभग 150 किलोग्राम प्लास्टिक कचरे का आधुनिक मशीनों से प्रसंस्करण किया जाता है। प्लास्टिक को पिघलाकर तैयार किए जाने वाले लम्प्स की बाजार में अच्छी मांग है और इन्हें 20 से 25 रुपये प्रति किलो की दर से बड़ी निर्माण कंपनियों को बेचा जाता है। पिछले छह महीनों में सभी संचालन खर्च, बिजली बिल, मशीनों के रखरखाव और श्रमिकों के मानदेय के भुगतान के बाद यह इकाई प्रतिमाह लगभग 15 हजार रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित कर रही है।

रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण का भी माध्यम

इस परियोजना ने स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। एएस पॉलिमर के साथ हुए समझौते के तहत स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार दिया गया है। श्रमिकों को मनरेगा दरों के समान साप्ताहिक मजदूरी के साथ बीमा कवरेज भी उपलब्ध कराया जा रहा है। परियोजना का सामाजिक पक्ष भी उल्लेखनीय है, जिसके तहत लाभ का 5 प्रतिशत हिस्सा ग्राम पंचायत को सामाजिक कल्याण गतिविधियों के लिए तथा 5 प्रतिशत हिस्सा शिव शक्ति स्व-सहायता समूह को महिला सशक्तिकरण और आजीविका गतिविधियों के लिए दिया जा रहा है।

पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास की नई दिशा

स्वच्छ भारत मिशन और मनरेगा के अभिसरण से तैयार यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास का सफल उदाहरण बन चुकी है। वर्ष 2024 में 18 लाख रुपये की लागत से भवन निर्माण और लगभग 8 लाख रुपये की लागत से मशीनरी स्थापित की गई। निजी भागीदारी के तहत एएस पॉलिमर ने भी परियोजना में निवेश किया है। कोलिहापुरी का यह मॉडल न केवल गांवों को कचरा मुक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए स्थायी आय और रोजगार का नया स्रोत भी बन रहा है। दुर्ग का यह नवाचार अब अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा का केंद्र बनता जा रहा है।

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