रायपुर, 08 जून। Water Conservation : जल ही जीवन है, यह केवल एक कहावत नहीं बल्कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित मानसून और लगातार बढ़ते जल संकट के दौर में जल संरक्षण आज विकास की अनिवार्य शर्त बन गया है। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ ने जल प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी का एक ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो न केवल जल सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती प्रदान कर रहा है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत संचालित ‘मोर गांव-मोर पानी’ महाअभियान प्रदेश में जल संरक्षण को जनआंदोलन का स्वरूप दे रहा है। यह अभियान केवल जल संरचनाओं के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार, महिला सशक्तिकरण, हरित विकास और ग्रामीण आजीविका को एक साथ जोड़ने वाला व्यापक विकास मॉडल बन चुका है।
एक लाख से अधिक जल संरचनाएं बदल रही गांवों की तस्वीर
अभियान के तहत प्रदेशभर में लगभग 1610 करोड़ रुपये की लागत से एक लाख से अधिक जल संरक्षण एवं संवर्धन कार्य किए जा रहे हैं। तालाब, डबरियां, खेत तालाब, चेकडैम, स्टैगर्ड कंटूर ट्रेंच और अन्य जल संरचनाओं के माध्यम से वर्षा जल को अधिकतम मात्रा में संरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है।
इन संरचनाओं का उद्देश्य केवल पानी रोकना नहीं है, बल्कि भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा देना, सिंचाई क्षमता बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता को स्थायी रूप से मजबूत बनाना है। इसका सकारात्मक प्रभाव खेती, पशुपालन और अन्य आजीविका गतिविधियों पर भी दिखाई देने लगा है।
जल संरक्षण के साथ रोजगार का बड़ा आधार
‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान ग्रामीण रोजगार का भी मजबूत माध्यम बनकर उभरा है। वर्तमान में इन कार्यों के जरिए प्रतिदिन 11 लाख से अधिक श्रमिकों को रोजगार मिल रहा है, जिनमें 57 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि जल संरक्षण के माध्यम से न केवल प्राकृतिक संसाधनों को बचाया जा रहा है, बल्कि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया जा रहा है।
आजीविका डबरियां बन रहीं आय का नया स्रोत
राज्य सरकार ने जल संरक्षण को सीधे ग्रामीण आजीविका से जोड़ने का अभिनव प्रयास किया है। प्रदेश में अब तक 13,065 आजीविका डबरियों का निर्माण किया जा चुका है। इन डबरियों में संचित जल का उपयोग मत्स्य पालन, सब्जी उत्पादन, बागवानी और अन्य आयवर्धक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। इससे ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आय के अवसर प्राप्त हो रहे हैं और कृषि पर निर्भरता का दायरा भी बढ़ रहा है।
इसी तरह ‘नवा तरिया-आय के जरिया’ पहल के अंतर्गत 624 सामुदायिक तालाबों का विकास किया जा रहा है। इन तालाबों को स्वयं सहायता समूहों, विशेषकर महिला समूहों की आजीविका से जोड़कर जल संरक्षण और आर्थिक सशक्तिकरण का एक प्रभावी मॉडल तैयार किया गया है।
पहाड़ियों पर ट्रेंच, मैदानों में जल संचयन
प्रदेश के पहाड़ी और ढलान वाले क्षेत्रों में स्टैगर्ड कंटूर ट्रेंच (SCT) का निर्माण बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। ये संरचनाएं वर्षा जल के तेज बहाव को नियंत्रित कर उसे भूमि में समाहित होने का अवसर देती हैं। इससे मिट्टी का कटाव कम होता है, भू-जल स्तर में सुधार आता है और वृक्षारोपण के लिए आवश्यक नमी उपलब्ध रहती है। जल संरक्षण और हरित विकास का यह समन्वय पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
छत्तीसगढ़ का यह अभियान आधुनिक तकनीक के उपयोग के कारण भी विशेष महत्व रखता है। कार्यों की वैज्ञानिक योजना और गुणवत्तापूर्ण क्रियान्वयन के लिए GIS आधारित युक्तधारा प्लानिंग, CLART एप तथा वाटरशेड सिद्धांतों का उपयोग किया जा रहा है।
भू-जल स्तर की निगरानी के लिए जलदूत प्रणाली लागू की गई है, जिसके माध्यम से खुले कुओं के जल स्तर का नियमित आकलन किया जा रहा है। ग्राम पंचायत स्तर पर जल बजट तैयार करने और जल उपयोग की योजना बनाने की दिशा में भी लगातार कार्य हो रहा है।
पारदर्शिता और जनभागीदारी बनी सफलता की कुंजी
मनरेगा के क्रियान्वयन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत में क्यूआर कोड आधारित सूचना प्रणाली विकसित की गई है। इसके माध्यम से ग्रामीण अपने गांव में स्वीकृत और पूर्ण कार्यों की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। रोजगार दिवस, आवास दिवस, सामाजिक अंकेक्षण और जनसंवाद जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों की सहभागिता और निगरानी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
जनप्रतिनिधियों, पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, युवाओं और ग्रामीण समुदाय की सक्रिय भागीदारी ने इस अभियान को जनआंदोलन का स्वरूप प्रदान किया है। ग्राम सभाओं और जनजागरूकता अभियानों के माध्यम से जल संरक्षण को लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
आज छत्तीसगढ़ का ‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान यह साबित कर रहा है कि जब सरकार, समाज और तकनीक एक साथ मिलकर काम करते हैं तो जल संकट जैसी चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है। यह अभियान केवल पानी बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि गांवों में समृद्धि, आत्मनिर्भरता और पर्यावरणीय संतुलन की नई नींव रख रहा है।

