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Folk Tradition : मिट्टी की सौंधी महक में बसती छत्तीसगढ़ की संस्कृति… लोक परंपराओं से जीवंत है छत्तीसगढ़ की पहचान

Folk Tradition: Chhattisgarh's culture resides in the earthy fragrance of the soil... Chhattisgarh's identity is brought to life by its folk traditions.

Folk Tradition

रायपुर, 12 मई। Folk Tradition : छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक कला, जनजातीय विरासत और आत्मीय लोकजीवन के कारण देशभर में विशेष पहचान रखता है। यहां की संस्कृति मिट्टी की सौंधी महक, लोकगीतों की मधुरता, त्योहारों की जीवंतता और सामाजिक समरसता से परिपूर्ण है। आधुनिकता के इस दौर में भी प्रदेश की लोक परंपराएं लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई हैं। गांवों की चौपालों से लेकर जनजातीय अंचलों तक संस्कृति हर रूप में जीवंत दिखाई देती है।

लोकगीत और लोकनृत्य में दिखती संस्कृति की झलक

छत्तीसगढ़ी भाषा की मिठास और सहजता यहां के लोकजीवन में साफ दिखाई देती है। ददरिया, सुआ गीत, करमा गीत और पंथी गीत आज भी ग्रामीण परिवेश में गूंजते हैं। इन गीतों में प्रेम, प्रकृति, श्रम और लोक आस्था का सुंदर चित्रण मिलता है। पंथी नृत्य, राउत नाचा, करमा नृत्य और सुआ नृत्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं। मांदर और ढोल की थाप पर किए जाने वाले ये नृत्य सामाजिक एकता और उत्सवधर्मिता का प्रतीक हैं।

बस्तर की जनजातीय संस्कृति बनी आकर्षण का केंद्र

बस्तर अंचल की जनजातीय संस्कृति छत्तीसगढ़ की आत्मा मानी जाती है। यहां के गोंड, मुरिया, हल्बा और अन्य जनजातीय समुदाय आज भी अपनी पारंपरिक जीवनशैली और सांस्कृतिक मूल्यों को संजोए हुए हैं। जंगल, नदी और पहाड़ इनके जीवन और आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बस्तर के हाट-बाजार केवल व्यापारिक केंद्र नहीं बल्कि सांस्कृतिक मेलजोल के जीवंत मंच भी हैं, जहां लोकगीत, नृत्य और हस्तशिल्प एक साथ दिखाई देते हैं।

ढोकरा कला और हस्तशिल्प को मिल रही नई पहचान

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प देशभर में प्रसिद्ध हैं। बस्तर की ढोकरा कला विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान बना चुकी है। धातु से बनी कलात्मक वस्तुएं, बांस और लकड़ी के हस्तशिल्प, मिट्टी के बर्तन और पारंपरिक आभूषण प्रदेश की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाते हैं। गोदना कला भी यहां की लोक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

त्योहारों में दिखती लोकजीवन की खुशियां

हरेली, पोला, तीजा और छेरछेरा जैसे त्योहार छत्तीसगढ़ की कृषि और लोक संस्कृति से गहराई से जुड़े हुए हैं। इन पर्वों में लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक व्यंजन पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देते हैं। बस्तर दशहरा प्रदेश की सांस्कृतिक परंपराओं का सबसे भव्य उदाहरण माना जाता है, जो लगभग 75 दिनों तक मनाया जाता है। मां दंतेश्वरी की आराधना और विशाल रथयात्रा यहां की सांस्कृतिक आस्था का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है।

परंपराओं के संरक्षण से मिल रही नई पहचान

राज्य सरकार, सांस्कृतिक संस्थाएं और स्थानीय समुदाय लोककला, लोकनृत्य और जनजातीय परंपराओं के संरक्षण के लिए लगातार कार्य कर रहे हैं। पर्यटन और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल रही है। लोक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने की यह पहल आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है।

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