Site icon AB News.Press

High Court Big Decision : 76 जवानों की शहादत…! दंतेवाड़ा नक्सली हमले में 16 साल बाद आया बड़ा फैसला…सभी आरोपी दोषमुक्त

High Court's Major Verdict: The Martyrdom of 76 Personnel...! Major Judgment Delivered 16 Years After the Dantewada Naxal Attack—All Accused Acquitted.

High Court's Major Verdict

रायपुर, 08 मई। High Court Big Decision : छत्तीसगढ के चर्चित 2010 दंतेवाड़ा माओवादी हमला मामले में बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है। 76 जवानों की शहादत वाले देश के सबसे बड़े नक्सली हमले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सभी 11 आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि असली अपराधियों की पहचान तक नहीं हो सकी।

बिलासपुर से आई इस खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। हाईकोर्टने 2010 के चर्चित 2010 दंतेवाड़ा माओवादी हमला मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी 11 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि जांच एजेंसियां इतने बड़े हमले के बावजूद असली अपराधियों की पहचान तक नहीं कर सकीं। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई मजबूत, वैज्ञानिक और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर पाया, जिससे आरोपियों की भूमिका संदेह से परे साबित हो सके।

6 अप्रैल 2010: जब दंतेवाड़ा दहल उठा था

दंतेवाड़ा के ताड़मेटला और चिंतलनार के जंगलों में 6 अप्रैल 2010 को नक्सलियों ने CRPF और पुलिस के संयुक्त दल पर घात लगाकर हमला किया था। घंटों चली मुठभेड़ में 75 CRPF जवान और एक पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। इसे देश के इतिहास का सबसे बड़ा नक्सली हमला माना जाता है।

कोर्ट ने जांच में बताईं बड़ी खामियां

अपने फ़ैसले में, हाई कोर्ट ने कई गंभीर कमियों को उजागर किया, जिसमें कहा गया है कि, किसी भी आरोपी की पहचान कोर्ट में नहीं हो पाई; कोई ‘टेस्ट आइडेंटिफ़िकेशन परेड’ (TIP) नहीं कराई गई; FSL रिपोर्ट जमा नहीं की गई; आरोपियों से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ; कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह से पालन नहीं किया गया; और परिस्थितिजन्य सबूतों की कड़ी अधूरी रह गई। कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि, किसी को भी सिर्फ़ शक के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

शहीद परिवारों को बड़ा झटका

इस फैसले के बाद शहीद जवानों के परिवारों में निराशा का माहौल बताया जा रहा है। 16 साल बाद भी हमले के असली गुनहगारों का पता नहीं चल पाना जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।

फिर उठे जांच एजेंसियों पर सवाल

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सल और आतंकी मामलों में तकनीकी जांच, फॉरेंसिक साक्ष्य और गवाहों की सुरक्षा बेहद अहम होती है। शुरुआती जांच में हुई चूक अदालत में पूरे केस को कमजोर कर देती है।

ताड़मेटला नरसंहार केस का यह फैसला अब सिर्फ कानूनी मामला नहीं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा और जांच तंत्र पर गंभीर बहस का विषय बन गया है।

Exit mobile version