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Naxal-Affected Santoshpur में बदली तस्वीर… झोपड़ी से पक्के घर तक… ‘नियद नेल्लनार योजना’ ने रमेश पासपुल को बनाया आत्मनिर्भर

A Transformed Landscape in Naxal-Affected Santoshpur... From a Hut to a Permanent Home... The ‘Niyad Nellanar Scheme’ Has Made Ramesh Paspaul Self-Reliant.

Naxal-Affected Santoshpur

रायपुर, 06 मई। Naxal-Affected Santoshpur (जनपद पंचायत बीजापुर) का यह गांव, जो कभी नक्सल प्रभाव से जूझता रहा, अब विकास और बदलाव की नई पहचान बनता जा रहा है। नियद नेल्लनार योजना के प्रभावी क्रियान्वयन से यहां बुनियादी सुविधाओं और रोजगार के अवसरों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इस परिवर्तन की कहानी के केंद्र में हैं गांव के निवासी रमेश पासपुल, जिन्होंने संघर्ष से सफलता तक का सफर तय किया।

आर्थिक तंगी से जूझता जीवन, भविष्य था अनिश्चित

रमेश पासपुल के पास पहले कोई स्थायी रोजगार नहीं था। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच आय का कोई निश्चित साधन न होने से उनका जीवन कठिनाइयों से घिरा हुआ था। सीमित संसाधनों और अवसरों के अभाव में उनका भविष्य अनिश्चित नजर आता था।

प्रशिक्षण बना जीवन का टर्निंग पॉइंट

परिस्थितियां तब बदलीं जब उन्हें “नियद नेल्लनार योजना” के तहत राजमिस्त्री (मेसन) का प्रशिक्षण मिला। इस प्रशिक्षण में उन्होंने निर्माण कार्य की तकनीकी जानकारी और व्यावहारिक कौशल सीखा, जिसने उनके जीवन को नई दिशा दी।

प्रधानमंत्री आवास योजना से मिला अपना घर

प्रशिक्षण के बाद वित्तीय वर्ष 2024-25 में रमेश को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास स्वीकृत हुआ। पहली किश्त मिलते ही उन्होंने खुद अपने घर का निर्माण शुरू किया और समय-सीमा में इसे पूरा भी कर लिया।

कौशल से बनी पहचान, बढ़ी आमदनी

रमेश के काम की गुणवत्ता देखकर गांव के अन्य लोगों ने भी अपने घर बनाने के लिए उन्हें बुलाना शुरू कर दिया। इससे उन्हें नियमित रोजगार मिलने लगा और वे एक कुशल राजमिस्त्री के रूप में पहचान बनाने में सफल हुए।

प्रेरणा बन रहे हैं रमेश पासपुल

आज रमेश पासपुल न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि गांव के अन्य लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत भी बन चुके हैं। उनकी सफलता यह दर्शाती है कि सही प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। रमेश की कहानी केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र में हो रहे सकारात्मक बदलाव का प्रतीक है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र से निकलकर आत्मनिर्भरता की राह पर बढ़ना आसान नहीं था, लेकिन योजनाओं और मेहनत के बल पर यह संभव हुआ।

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