रायपुर, 30 अप्रैल। Sustainable Farming : प्रदेश में टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए हरी खाद का उपयोग तेजी से प्रचलन में आ रहा है। रासायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग से प्रभावित हो रही मिट्टी की सेहत को सुधारने के लिए कृषि विभाग किसानों को इस प्राकृतिक विकल्प को अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।
क्या है हरी खाद और क्यों है जरूरी?
हरी खाद एक ऐसी सहायक फसल होती है, जिसे मुख्य फसल से पहले उगाकर फूल आने की अवस्था में मिट्टी में मिला दिया जाता है। ढैंचा, सनई, मूंग और उड़द जैसी फसलें इसके लिए उपयुक्त मानी जाती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इससे मिट्टी में नाइट्रोजन और जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, जिससे जमीन अधिक उपजाऊ बनती है।
मिट्टी की सेहत में सुधार, उत्पादन में बढ़ोतरी
हरी खाद का उपयोग मिट्टी की भौतिक और रासायनिक संरचना को मजबूत करता है। इससे मिट्टी भुरभुरी बनती है, जलधारण क्षमता बढ़ती है और फसल की जड़ों का विकास बेहतर होता है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इसके उपयोग से फसल उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि देखी जा सकती है।
लागत घटेगी, किसानों की आय बढ़ेगी
हरी खाद के इस्तेमाल से यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, जिससे खेती की लागत घटती है। कम लागत और बेहतर उत्पादन के चलते किसानों की आय में भी वृद्धि होती है।
यह विधि छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से लाभकारी साबित हो रही है।
पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका
हरी खाद न केवल खेती के लिए फायदेमंद है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है। यह मिट्टी में सूक्ष्मजीवों और केंचुओं की संख्या बढ़ाती है, जिससे प्राकृतिक संतुलन बना रहता है और रासायनिक प्रदूषण कम होता है।
सरकार की पहल: बीज उपलब्ध कराने की तैयारी
कृषि विभाग द्वारा खरीफ सीजन से पहले हरी खाद के बीज उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई है। इसके लिए ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से किसानों से मांग एकत्र कर बीज वितरण सुनिश्चित किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान हर दूसरे या तीसरे वर्ष हरी खाद का उपयोग करें, तो मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रह सकती है।
हरी खाद केवल एक उर्वरक नहीं, बल्कि टिकाऊ खेती की दिशा में एक मजबूत कदम है, जो किसानों की समृद्धि और पर्यावरण संरक्षण दोनों सुनिश्चित करता है।

