रायपुर, 23 अप्रैल। LemonGrass Farming : छत्तीसगढ में कम पानी और बंजर भूमि वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए लेमनग्रास की खेती एक लाभकारी विकल्प के रूप में उभर रही है। यह फसल एक बार लगाने के बाद 5 से 6 वर्षों तक उत्पादन देती है और इसके तेल की मांग अधिक होने के कारण पारंपरिक फसलों की तुलना में कई गुना अधिक आय प्रदान करती है।
छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा किसानों के लिए विशेष पहल की गई है। वन मंत्री केदार कश्यप, बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम और उपाध्यक्ष अंजय शुक्ला ने जल संकट से जूझ रहे किसानों के लिए इस योजना को आगे बढ़ाया है।
मुफ्त पौधे और प्रशिक्षण की सुविधा
बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी JACS राव ने बताया कि किसानों को लेमनग्रास की उन्नत “अब्दुल कलाम” किस्म के पौधे निशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसके साथ ही खेती का प्रशिक्षण भी मुफ्त दिया जाएगा, जिससे किसान आसानी से इस फसल को अपना सकें।
उन्नत किस्म से बेहतर गुणवत्ता और आय
“अब्दुल कलाम” किस्म (सीपीके-एफ2-38) वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई है, जिसमें सिट्रल की मात्रा 75 से 80 प्रतिशत तक होती है। इस कारण इसका उपयोग इत्र, सुगंध और फ्लेवर उद्योग में आवश्यक तेल उत्पादन के लिए किया जाता है, जिससे किसानों को बेहतर बाजार मूल्य मिलता है।
कम पानी में सफल उत्पादन
यह फसल कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी आसानी से उगाई जा सकती है। बलुई दोमट मिट्टी और अच्छी जल निकासी इसके लिए उपयुक्त मानी जाती है। रोपण के दौरान पौधों के बीच उचित दूरी रखकर बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन में योगदान
लेमनग्रास की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ाती है, बल्कि जल संरक्षण और भूमि सुधार में भी सहायक होती है। यह पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पृथ्वी दिवस पर विशेष जागरूकता अभियान
पृथ्वी दिवस के अवसर पर 22 अप्रैल को विशेष जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, जिसमें किसानों को इस फसल के लाभ बताए जाएंगे और अधिक से अधिक किसानों को इससे जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

