रायपुर, 13 अप्रैल। Sustainable Farming : छत्तीसगढ़ में घटती मृदा उर्वरता और बढ़ती खेती लागत के बीच कृषि विभाग ने किसानों के लिए एक प्रभावी और टिकाऊ समाधान के रूप में हरी खाद अपनाने की अपील की है। लगातार सघन खेती और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की सेहत कमजोर होती जा रही है, ऐसे में हरी खाद खेती के साथ-साथ मिट्टी के पुनर्जीवन का माध्यम बनकर सामने आई है।
मिट्टी की सेहत सुधारने का सरल उपाय
हरी खाद दलहनी फसलों जैसे ढैंचा, सनई, मूंग और लोबिया को उगाकर फूल आने से पहले ही खेत में मिलाने की प्रक्रिया है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है। यह प्रक्रिया मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाती है और उसे लंबे समय तक उपजाऊ बनाए रखने में सहायक होती है।

घटती उर्वरता के बीच उम्मीद की किरण
बढ़ती जनसंख्या और घटते जोत क्षेत्र के कारण किसान एक ही भूमि पर बार-बार खेती कर रहे हैं, जिससे मिट्टी में जैविक कार्बन और पोषक तत्वों की कमी स्पष्ट दिखाई देने लगी है। ऐसे समय में हरी खाद न केवल एक विकल्प है, बल्कि टिकाऊ खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन चुकी है।
प्राकृतिक टॉनिक के रूप में हरी खाद
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार हरी खाद मिट्टी के लिए प्राकृतिक टॉनिक की तरह काम करती है। दलहनी फसलों की जड़ों में पाए जाने वाले राइजोबियम जीवाणु वायुमंडल से नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो जाती है और लागत में कमी आती है।
मिट्टी को मिलते हैं कई लाभ
हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन की पूर्ति होती है, फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ती है और जिंक, आयरन व कॉपर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व सुलभ हो जाते हैं। इसके साथ ही मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है, संरचना भुरभुरी होती है और खरपतवार व कीटों पर प्राकृतिक नियंत्रण मिलता है।

नाइट्रोजन का समृद्ध स्रोत
ढैंचा जैसी फसल एक एकड़ में 55 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रदान करती है, जो लगभग तीन बोरी यूरिया के बराबर है। इसी प्रकार सनई, बरसीम और लोबिया भी पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन उपलब्ध कराती हैं, जिससे खेती अधिक किफायती बनती है।
सही समय पर बुवाई जरूरी
कृषि विभाग ने सलाह दी है कि सिंचित क्षेत्रों में मई माह में और असिंचित क्षेत्रों में वर्षा पूर्व जून में हरी खाद की बुवाई की जाए। 40 से 50 दिन बाद फसल को हरी अवस्था में ही जुताई कर मिट्टी में मिला देना चाहिए, जिससे अधिकतम लाभ प्राप्त हो सके। हरी खाद अपनाकर किसान न केवल अपनी लागत कम कर सकते हैं, बल्कि अपनी भूमि को लंबे समय तक उपजाऊ बनाए रख सकते हैं। यह पद्धति आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और समृद्ध कृषि व्यवस्था की नींव रखती है।

