रायपुर, 11 अप्रैल। Green Manure : छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में कृषि विभाग ने मिट्टी की घटती उर्वरता और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर चिंता जताई है। विभाग ने किसानों से हरी खाद अपनाने का आह्वान किया है, जिसे मृदा स्वास्थ्य सुधारने का सबसे सस्ता, सरल और टिकाऊ उपाय बताया गया है।
बढ़ती जनसंख्या और घटते जोत के कारण किसान एक ही भूमि पर लगातार खेती करने को मजबूर हैं, जिससे मिट्टी में जैविक कार्बन और पोषक तत्वों की कमी तेजी से बढ़ रही है। वहीं रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग और पशुधन में कमी से गोबर खाद की उपलब्धता भी घट रही है।
क्या है हरी खाद?
हरी खाद (ग्रीन मैन्योर) उन फसलों को कहा जाता है जिन्हें उगाकर हरी अवस्था में ही खेत में जुताई कर मिट्टी में मिला दिया जाता है। ये मुख्यतः दलहनी फसलें होती हैं, जिनकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करते हैं।
प्रमुख हरी खाद फसलें हैं:
- ढैंचा
- सन
- मूंग
- उड़द
- लोबिया
- ग्वारफली
- बरसीम
एक समाधान, कई फायदे
हरी खाद के उपयोग से:
- मिट्टी में नाइट्रोजन की पूर्ति होती है
- फॉस्फोरस की घुलनशीलता बढ़ती है
- सूक्ष्म पोषक तत्व (जिंक, आयरन, कॉपर, मैग्नीज) उपलब्ध होते हैं
- मिट्टी की संरचना सुधरती है और जल धारण क्षमता बढ़ती है
- खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोग में कमी आती है
सबसे बड़ी बात, इससे रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम होती है और किसानों की लागत घटती है, जिससे आय में वृद्धि होती है।
ढैंचा: प्राकृतिक ‘यूरिया’ का विकल्प
कृषि विभाग के अनुसार ढैंचा सबसे प्रभावी हरी खाद फसल है, जो प्रति एकड़ 55 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध कराती है। यह लगभग 120 से 130 किलोग्राम यूरिया (करीब 3 बोरी) के बराबर है।
अन्य फसलों से भी नाइट्रोजन प्राप्त होती है:
- सन: 45–50 किग्रा/एकड़
- बरसीम: 48–50 किग्रा/एकड़
- लोबिया/ग्वारफली: 22–30 किग्रा/एकड़
सही समय पर करें बुवाई
- खरीफ सीजन:
- सिंचित क्षेत्रों में मई में बुवाई
- असिंचित क्षेत्रों में वर्षा पूर्व जून में बुवाई
- 40–50 दिन बाद फसल को जुताई कर मिट्टी में मिलाएं
- रबी सीजन:
- बरसीम/रिजका की बुवाई अक्टूबर-नवंबर
- 50–60 दिन बाद खेत में पलटें
किसानों से अपील
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे इस खरीफ सीजन से ही हरी खाद को खेती का अनिवार्य हिस्सा बनाएं। यह न केवल उनकी लागत कम करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ भूमि भी सुरक्षित रखेगा। अधिक जानकारी के लिए किसान जिला कृषि कार्यालय एवं मृदा परीक्षण कार्यालय, सूरजपुर से संपर्क कर सकते हैं।

