Victory over Naxalism : अमित शाह की रणनीति…साय सरकार का एक्शन…! नक्सलवाद पर बड़ी जीत

Victory over Naxalism : अमित शाह की रणनीति…साय सरकार का एक्शन…! नक्सलवाद पर बड़ी जीत

रायपुर/बस्तर, 31 मार्च। Victory over Naxalism : छत्तीसगढ़, खासकर बस्तर, जहां कभी नक्सलवाद अपनी जड़ें जमाए हुए था, अब लगभग पूरी तरह इस समस्या से मुक्त होता दिख रहा है। करीब 5 दशकों तक चले इस संघर्ष के बाद सुरक्षा बलों और सरकार के संयुक्त प्रयासों ने नक्सलवाद को निर्णायक रूप से कमजोर कर दिया है। 31 मार्च 2026 को इस लड़ाई के अंत का प्रतीकात्मक दिन माना जा रहा है।

1968 से शुरू हुआ लाल आतंक का सफर

नक्सलियों ने साल 1968 में आंध्रप्रदेश के रास्ते अविभाजित मध्यप्रदेश के बस्तर क्षेत्र में प्रवेश किया। शुरुआत में उन्होंने विचारधारा का प्रचार किया, लेकिन धीरे-धीरे संगठन को मजबूत करते हुए ग्रामीणों को हथियार, प्रशिक्षण और विस्फोटक बनाने की तकनीक सिखाई। उन्होंने ‘जनताना सरकार; बनाकर गांवों में समानांतर सत्ता स्थापित की, जहां जनअदालतें लगती थीं और मौके पर ही सजा दी जाती थी।

1990 से 2010: चरम पर नक्सलवाद

1990 के दशक में नक्सलवाद सरगुजा तक पहुंचा और 2010 तक यह अपने चरम पर रहा। इस दौरान कई बड़े हमले हुए और सुरक्षा बलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लूरी के नेतृत्व में आक्रामक अभियान चलाया गया, जिसमें एक-एक कर नक्सलियों को खत्म किया गया। 2015 में सरगुजा को नक्सलमुक्त घोषित कर दिया गया।

बस्तर बना आखिरी गढ़

सरगुजा से भागे नक्सली बस्तर में आकर छिप गए। इंद्रावती नदी, घने जंगल और पहाड़ उनके लिए सुरक्षा कवच बने। तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड से सटे होने के कारण वे आसानी से सीमा पार कर जाते थे, जिससे अभियान चुनौतीपूर्ण बना रहा।

2024 के बाद निर्णायक कार्रवाई

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निर्देश पर 2024 में केंद्र और राज्यों ने संयुक्त रणनीति अपनाई। करीब 72,000 जवानों की तैनाती, आधुनिक तकनीक और एजेंसियों की निगरानी से ऑपरेशन तेज हुआ। एक-एक कर बड़े नक्सली नेता मारे गए।

21 मई 2025: टर्निंग पॉइंट

21 मई 2025 को नक्सलियों के महासचिव बसवाराजू के मारे जाने के बाद संगठन को बड़ा झटका लगा। इसके बाद तेजी से सरेंडर का दौर शुरू हुआ।

हिड़मा की मौत के बाद साफ हुई तस्वीर

18 नवंबर 2025 को कुख्यात नक्सली हिड़मा की मौत के बाद यह स्पष्ट हो गया कि नक्सलवाद का अंत निकट है। अब तक, 535 नक्सली मारे गए। 2898 ने सरेंडर किया। अधिकांश बड़े कैडर या तो खत्म हो चुके हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं।

अब सिर्फ मुट्ठीभर नक्सली बाकी

सुरक्षा बलों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में अब केवल 23 नक्सली ही बचे हैं, जो गांवों में छिपे हुए हैं। उन्हें लगातार आत्मसमर्पण करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हालांकि, कुछ प्रमुख चेहरे अभी भी फरार हैं, जैसे कि गणपति (तेलंगाना में) और मिसिर बेसरा (झारखंड में)।

बस्तर की दर्दनाक कहानी: तिरंगा फहराने पर हत्या

कांकेर जिले के बिनागुंडा गांव में 15 अगस्त 2025 को ग्रामीणों ने पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया और तिरंगा फहराया। यह बात नक्सलियों को नागवार गुजरी। दो दिन बाद उन्होंने युवक मनेश नुरेटी का अपहरण कर ‘जनअदालत’ में उसकी हत्या कर दी और उसे पुलिस मुखबिर बताया। यह घटना नक्सलवाद के क्रूर चेहरे की एक और मिसाल बनकर सामने आई।

लोकतंत्र की जीत का प्रतीक दिन

24 अगस्त 2024 को रायपुर में अमित शाह ने दावा किया था कि 31 मार्च 2026 तक देश नक्सलवाद से मुक्त हो जाएगा। आज, छत्तीसगढ़ लगभग इस लक्ष्य को हासिल कर चुका है। यह केवल एक सुरक्षा अभियान की सफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र, विकास और आम लोगों के साहस की जीत है। यह उन जवानों के बलिदान का परिणाम है, जिन्होंने वर्षों तक इस लड़ाई को लड़ा। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का अंत एक ऐतिहासिक मोड़ है। अब चुनौती है, विकास, विश्वास और स्थायी शांति को बनाए रखना, ताकि बस्तर जैसे क्षेत्र हमेशा के लिए हिंसा से मुक्त रह सकें।

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