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Bilaspur Real Estate Scam : 60 की जगह 90 फ्लैट को मिली मंजूरी…फर्जी आर्किटेक्ट के नाम पर सैकड़ों नक्शे पास

Bilaspur Real Estate Scam: Approval Granted for 90 Flats Instead of 60... Hundreds of Building Plans Cleared in the Name of a Fraudulent Architect

Bilaspur Real Estate Scam

बिलासपुर, 16 मार्च। Bilaspur Real Estate Scam : छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में शहरी विकास से जुड़े एक बड़े कथित रियल एस्टेट घोटाले का मामला सामने आया है। नगर निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग (TCP) की स्वीकृति प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। दस्तावेजों की जांच में पता चला कि जहां एरिया स्टेटमेंट में केवल 60 फ्लैट का उल्लेख था, वहीं विभागीय स्वीकृति में 90 फ्लैट और छह मंजिला भवन का नक्शा पास कर दिया गया।

‘अनंत रियाल्टी’ प्रोजेक्ट से जुड़ा मामला

यह मामला शहर के अज्ञया नगर क्षेत्र में प्रस्तावित ‘मेसर्स अनंत रियाल्टी’ प्रोजेक्ट से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि बिल्डर नमन गोयल ने विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत से निर्माण नियमों और मास्टर प्लान को नजरअंदाज करते हुए स्वीकृति हासिल की। विशेषज्ञों का कहना है कि एरिया स्टेटमेंट और स्वीकृत नक्शे के बीच इतना बड़ा अंतर सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं माना जा सकता।

फर्जी आर्किटेक्ट के नाम पर मंजूरियां

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह सामने आया कि दस्तावेजों में जिस आर्किटेक्ट का नाम दर्ज है ‘विकास सिंह’, उस नाम का कोई पंजीकृत आर्किटेक्ट या इंजीनियर शहर में मौजूद ही नहीं है। नगर निगम के रिकॉर्ड और पेशेवर संस्थाओं में भी इस नाम का कोई आधिकारिक पंजीकरण नहीं मिला।

जांच में यह भी पता चला कि इसी नाम का उपयोग कर शहर में 400 से अधिक भवनों के नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट मंजूर किए गए। यानी एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर वर्षों तक निर्माण स्वीकृतियां जारी होती रहीं, जिसका वास्तविक अस्तित्व ही संदिग्ध है।

अवैध निर्माण से खुला मामला

नगर निगम द्वारा पुराने बस स्टैंड के पास स्थित महुआ होटल में अवैध निर्माण के खिलाफ की गई कार्रवाई के दौरान भी इस नेटवर्क की झलक सामने आई। जांच में पाया गया कि होटल का नक्शा भी ‘विकास सिंह’ के नाम से स्वीकृत किया गया था और निर्माण में ओपन स्पेस और पार्किंग जैसी शर्तों का उल्लंघन किया गया था। बाद में इस नाम से जुड़े लाइसेंस को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।

EWS आवास पर भी सवाल

नियमों के अनुसार बड़े आवासीय प्रोजेक्ट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आवास आरक्षित करना अनिवार्य होता है। संबंधित प्रोजेक्ट के लिए बिल्डर द्वारा ग्राम तिफरा की जमीन पर EWS फ्लैट बनाने का शपथपत्र दिया गया था। लेकिन राजस्व रिकॉर्ड की जांच में सामने आया कि जिस जमीन का उल्लेख किया गया है, वह बिल्डर के नाम पर दर्ज ही नहीं है, जिससे पूरे मामले पर और संदेह गहरा गया है।

एक ही दिन में 29 लेआउट को मंजूरी

जांच में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में एक ही दिन में 29 लेआउट फाइलों को मंजूरी दे दी गई। शहरी नियोजन विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य प्रक्रिया में इतनी बड़ी संख्या में फाइलों को एक ही दिन में मंजूर करना लगभग असंभव है, जिससे विभागीय मिलीभगत की आशंका और मजबूत होती है।

करोड़ों के लेनदेन की आशंका

नगर निगम के अनुमान के अनुसार एक एकड़ रिहायशी लेआउट की स्वीकृति के लिए 75 हजार से 2.5 लाख रुपये तक खर्च आता है, जबकि मकान के नक्शे की स्वीकृति के लिए 8 हजार से 20 हजार रुपये तक शुल्क लिया जाता है। ऐसे में 400 से अधिक नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत होने के पीछे करोड़ों रुपये के लेनदेन की आशंका जताई जा रही है। इस पूरे मामले के सामने आने के बाद शहर में शहरी विकास तंत्र की पारदर्शिता और निर्माण स्वीकृति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस कथित नक्शा और लेआउट घोटाले की जांच कितनी गंभीरता से करता है और क्या दोषियों की जवाबदेही तय हो पाती है या नहीं।

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