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Court Contempt Relief : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अधिवक्ता को अवमानना से दी राहत…! भविष्य में गरिमा बनाए रखने की दी सख्त चेतावनी

Court Contempt Relief: The Chhattisgarh High Court granted relief from contempt to an advocate… and issued a stern warning to maintain dignity in the future.

Court Contempt Relief

बिलासपुर, 20 फरवरी। Court Contempt Relief : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने न्यायालय की गरिमा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए अवमानना के घेरे में आए एक अधिवक्ता को राहत प्रदान की है। यह राहत उस समय मिली जब अधिवक्ता ने बिना शर्त माफी मांगते हुए अपनी गलती स्वीकार की और अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाने के लिए खेद व्यक्त किया।

मामला उस समय शुरू हुआ जब अंबिकापुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) द्वारा अधिवक्ता के अनुचित आचरण और टिप्पणी को लेकर हाई कोर्ट को एक रेफरेंस भेजा गया था। रेफरेंस में यह बताया गया था कि अधिवक्ता ने अदालत की कार्यवाही के दौरान अनुचित व्यवहार किया और न्यायालय की गरिमा के प्रतिकूल टिप्पणी की। इसके बाद हाई कोर्ट ने अधिवक्ता को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।

सुनवाई और माफी की प्रक्रिया

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच के समक्ष इस मामले की सुनवाई हुई। अधिवक्ता व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित हुए और शपथ पत्र के माध्यम से अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि वे पिछले लगभग तीन दशकों से विधि पेशे से जुड़े हुए हैं और संबंधित घटना क्षणिक आवेश में हुई थी।

अधिवक्ता ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य कभी भी न्यायालय या न्यायाधीश की गरिमा को ठेस पहुंचाना नहीं था। उन्होंने अपनी गलती पर खेद व्यक्त करते हुए यह भरोसा भी दिया कि भविष्य में इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न नहीं होने देंगे।

हाई कोर्ट का निर्णय

हाई कोर्ट ने अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत बिना शर्त माफी, उनके पेशेवर अनुभव और पश्चाताप को ध्यान में रखते हुए अवमानना कार्यवाही को समाप्त कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि न्यायालय की गरिमा सर्वोपरि है और अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान बनाए रखें। हालांकि, अधिवक्ता द्वारा अपनी गलती स्वीकार करने और माफी मांगने को सकारात्मक मानते हुए अदालत ने उन्हें भविष्य के लिए सख्त चेतावनी भी दी।

महत्वपूर्ण संदेश

यह फैसला न्यायिक मर्यादा और अनुशासन के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संदेश गया है कि न्यायालय अपनी गरिमा से जुड़े मामलों में सख्त है, लेकिन यदि कोई गलती स्वीकार कर सुधार की भावना दिखाता है तो न्यायालय विवेकपूर्ण तरीके से अपना निर्णय देता है। इस फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ कि न्यायालय के प्रति सम्मान और अनुशासन बनाए रखना प्रत्येक अधिवक्ता की जिम्मेदारी है।

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