Himalayan glaciers melting : हिमालयी ग्लेशियरों का संकट, नेपाल से भारत तक 200 करोड़ लोगों पर मंडरा रहा खतरा

Himalayan glaciers melting : हिमालयी ग्लेशियरों का संकट, नेपाल से भारत तक 200 करोड़ लोगों पर मंडरा रहा खतरा

Himalayan glaciers melting

नेपाल सहित हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में तेजी से पिघलते ग्लेशियर दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। यह क्षेत्र आठ देशों में फैला हुआ है और यहां लगभग 56,000 ग्लेशियर मौजूद हैं, जो अब तेजी से सिकुड़ रहे हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के अनुसार, 2011 से 2020 के बीच इन ग्लेशियरों का पिघलना पिछले दशक की तुलना में 65% अधिक तेजी से हुआ है। अगर यही रफ्तार बनी रही तो इस सदी के अंत तक ये ग्लेशियर अपने आयतन का 80% तक खो सकते हैं।

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माउंट एवरेस्ट के पास स्थित साउथ कोल ग्लेशियर 1990 के दशक से अब तक 54 मीटर तक पतला हो चुका है। ICIMOD के क्रायोस्फियर विशेषज्ञ शरद जोशी बताते हैं कि ऊंचाई और ठंड के बावजूद, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव यहां साफ देखे जा सकते हैं। जोशी ने कहा कि ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ेगा, जिससे तटीय क्षेत्रों पर संकट गहराएगा और हिमालय क्षेत्र के जल संसाधनों पर भी गंभीर असर पड़ेगा।

Himalayan glaciers melting

नेपाल की लंगटांग घाटी का याला ग्लेशियर, जो कि देश के सबसे ज्यादा अध्ययन किए गए ग्लेशियरों में शामिल है, अब अपनी अंतिम अवस्था में है। यह ग्लेशियर 1974 से 2021 तक अपने क्षेत्रफल का एक तिहाई से अधिक खो चुका है और अगले 20-25 वर्षों में पूरी तरह से विलुप्त हो सकता है। याला ग्लेशियर को हाल ही में ग्लोबल ग्लेशियर कैजुअल्टी लिस्ट में शामिल किया गया है, जो हाल ही में विलुप्त या गंभीर रूप से खतरे में पड़े ग्लेशियरों की एक वैश्विक सूची है।

ग्लेशियरों के पीछे हटने से प्रोग्लेशियल झीलें बन रही हैं, जो बर्फ या मलबे से बने अस्थायी बांधों के पीछे होती हैं। ये झीलें अचानक टूटने पर बाढ़ और तबाही ला सकती हैं, जिससे भारत, नेपाल और अन्य पड़ोसी देशों में आपदाएं बढ़ सकती हैं।

Himalayan glaciers melting

जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न बदल रहे हैं। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी अब बर्फबारी की जगह अधिक बारिश हो रही है, जिससे ग्लेशियरों को पुनः भरने का प्राकृतिक चक्र बाधित हो रहा है।

यह संकट केवल नेपाल या हिमालय तक सीमित नहीं है। यह दक्षिण एशिया के उन 200 करोड़ लोगों के लिए खतरे की घंटी है, जो सीधे या परोक्ष रूप से हिमालयी नदियों और जल संसाधनों पर निर्भर हैं। इस आपदा से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग, जलवायु नीति में बदलाव और त्वरित वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता है।

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