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Jagadguru Rambhadracharya : रामभद्राचार्य का विवादित बयान, मनु स्मृति और ज्ञानवापी पर दी खुली चुनौती

Jagadguru Rambhadracharya

वाराणसी। जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने एक बार फिर बड़ा बयान देकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी है। मनु स्मृति विवाद पर बोलते हुए उन्होंने खुली चुनौती दी कि “जिसकी मां ने शुद्ध दूध पिलाया है, वह हमसे चर्चा करे।” उनका यह बयान बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और मायावती पर निशाना साधने के रूप में देखा जा रहा है।

बात दें कि BHU में व्याकरण विभाग की कार्यशाला के उद्घाटन पर पहुंचे जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने कहा कि मनुस्मृति भारत का पहला संविधान है और डॉ. अंबेडकर द्वारा इसे जलाना गलत था। उन्होंने जातिगत आरक्षण खत्म कर आर्थिक आधार पर लागू करने की बात कही। हरियाणा में ब्राह्मणों पर हुए हमलों की निंदा करते हुए हिंदुओं से आत्मरक्षा के लिए तैयार रहने का आह्वान किया। इस बीच, BHU में मनुस्मृति जलाने की कोशिश पर 13 छात्रों की गिरफ्तारी भी हुई।

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मनु स्मृति विवाद पर रामभद्राचार्य का बयान

रामभद्राचार्य ने मनु स्मृति की आलोचना करने वालों पर निशाना साधते हुए कहा कि मनु महाराज और प्राचीन ऋषियों की न्याय परंपरा ही भारत का आधार रही है। उन्होंने दावा किया कि मनु स्मृति में राष्ट्र-विरोधी कुछ भी नहीं लिखा गया है। उनका कहना था कि अगर बाबा साहब अंबेडकर को संस्कृत का ज्ञान होता, तो वे मनु स्मृति को जलाने का प्रयास नहीं करते। उन्होंने मायावती पर भी कटाक्ष किया और कहा कि उन्हें मनु स्मृति के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

ज्ञानवापी विवाद को लेकर बड़ा बयान

ज्ञानवापी विवाद को लेकर रामभद्राचार्य ने कहा कि जब तक ज्ञानवापी नहीं मिलेगा, तब तक वे चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की। यह बयान ऐसे समय में आया है जब ज्ञानवापी विवाद अदालत में लंबित है और इस पर हिंदू और मुस्लिम पक्षों में लगातार बहस जारी है।

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काशी के मोहल्लों के नाम बदलने की मांग

रामभद्राचार्य ने काशी में मुगलों के नाम पर रखे गए मोहल्लों के नाम बदलने की मांग भी उठाई। उन्होंने कहा कि यह विषय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने रखा जाएगा और इस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने काशी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को पुनर्स्थापित करने पर जोर दिया।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

रामभद्राचार्य के इस बयान पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कड़ी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। दलित संगठनों और अंबेडकर समर्थकों ने इस बयान की आलोचना करते हुए इसे असंवेदनशील करार दिया है, वहीं कुछ हिंदू संगठनों ने उनका समर्थन किया है।

रामभद्राचार्य के ये बयान निश्चित रूप से एक नई बहस को जन्म देंगे। मनु स्मृति, ज्ञानवापी विवाद और काशी के मोहल्लों के नाम बदलने जैसी मांगें देश में सामाजिक और धार्मिक चर्चाओं को तेज कर सकती हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और अन्य राजनीतिक दल इस पर क्या रुख अपनाते हैं।

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