Women’s Day Special
रायपुर। द्रौपदी मुर्मू की जीवन गाथा एक असाधारण संघर्ष और अटूट हौसले की मिसाल है। कठिनाइयों से भरे जीवन में उन्होंने जो सहा, वह किसी के भी हौसले को तोड़ सकता था, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय खुद को एक नए संकल्प के साथ खड़ा किया। और समाज के लिए आज मिसाल बनी।
संघर्षों से भरा जीवन
1983 में, जब वह ओडिशा सरकार के सिंचाई विभाग में क्लर्क थीं और उनके पति एक प्राइवेट बैंक में कार्यरत थे, तो पारिवारिक परिस्थितियां बहुत कठिन थीं। अलग-अलग राज्यों में नौकरी करने के कारण अपनी छोटी बेटी की देखभाल करना उनके लिए चुनौती बन गया। दुर्भाग्य से, निमोनिया से उनकी तीन साल की बेटी की मौत हो गई। परिवार के दबाव के चलते उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और अपने पति के साथ रहने का फैसला किया।
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परिवार संभल ही रहा था कि साल 2010 में उनके बड़े बेटे की मौत हो गई। ढाई साल बाद, छोटे बेटे का भी सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। लगातार यह सदमे सहना किसी भी इंसान के लिए असहनीय होता, लेकिन उनके जीवन की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। कुछ ही समय में उनकी मां और भाई का भी निधन हो गया, और 2014 में पति की मौत ने उन्हें पूरी तरह अकेला कर दिया।
चार साल में पांच अपनों को खोने का दर्द, जिसने उन्हें गहरे डिप्रेशन में धकेल दिया। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। अपनी आस्था और आत्मबल से खुद को संभाला और समाज सेवा में खुद को समर्पित कर दिया।
राजनीतिक सफर और राष्ट्रपति पद तक का सफर
- राजनीति में कदम – ओडिशा विधानसभा चुनाव 2000 में भाजपा से जीत दर्ज की।
- राज्यपाल पद – 2015 में झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनीं।
- राष्ट्रपति चुनाव – 2022 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया, और 25 जुलाई 2022 को वह भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनीं।
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प्रेरणा की मिसाल
द्रौपदी मुर्मू का जीवन संघर्ष, धैर्य और दृढ़ संकल्प की कहानी है। उन्होंने बार-बार साबित किया कि जीवन में कैसी भी परिस्थिति आए, अगर हिम्मत और आत्मविश्वास हो, तो कोई भी बाधा आपको अपने लक्ष्य तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। उनकी कहानी हर किसी को कठिनाइयों में भी अडिग रहने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

