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रायपुर। छत्तीसगढ़ के अंधिकांश जिलों में अतिथि व्याख्याता नीति 2024 का खुलेआम चयन समिति और शासकीय महाविद्यालयों के प्राचार्यों द्वारा धज्जियां उड़ाई जा रही है। नीति के कंडिका 5.4 में कहा गया हैं कि छत्तीसगढ़ के मूलनिवासी अभ्यर्थियों को प्राथमिकता दी जाएगी। लेकिन चयन समिति ने बलरामपुर जिले से लेकर बस्तर तक के महाविद्यालयों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखंड, ओडिशा, दिल्ली, बंगाल एवं राजस्थान के अभ्यर्थियों को चयन सूची में प्राथमिकता देकर नियुक्ति दिया जा रहा है।


बता दें कि, मूलनिवासी का मतलब हैं कि आवेदक छत्तीसगढ़ का नागरिक होना चाहिए और वह या उसके माता पिता 1950 के बाद से छत्तीसगढ़ के स्थायी निवासी हो लेकिन अतिथि व्याख्याता चयन प्रक्रिया में इसका पालन बिलकुल भी नहीं किया जा रहा ।
बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों को प्राथमिकता
दरअसल, अतिथि व्याख्याता अंकुश सिंह सिसोदिया ने आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ के मूलनिवासी अभ्यर्थियों के अधिकारों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है। उनके अनुसार, स्थानीय-निवासी प्रमाणपत्रों का दुरुपयोग कर बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों को प्राथमिकता दी जा रही है।



अंकसूची के आधार पर चयन करना गलत
वहीं पूर्व व्याख्याता स्वाति यादव ने आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ के महाविद्यालयों में बाहरी राज्यों से आए एमफिल और पीएचडी कैंडिडेट्स के सर्टिफिकेट और यूजीसी विनियम पालन के अस्थायी प्रमाणपत्रों की कोई जांच नहीं की जा रही है। केवल अंकसूची के आधार पर पीएचडी और एमफिल कैंडिडेट्स का चयन करना गलत है। उन्होंने कहा कि आयुक्त ने संदिग्ध एमफिल और पीएचडी डिग्री की सूक्ष्म जांच का आदेश भी जारी किया था, लेकिन सरगुजा और बस्तर जैसे क्षेत्रों में संदिग्ध और बाहरी राज्यों की अंकसूचियों की भरमार है।
आउटसोर्सिंग को बढ़ावा
अध्यक्ष लव कुमार वर्मा ने कहा कि बाहरी राज्यों के लोगों को प्राथमिकता देकर नियुक्तियां दी जा रही हैं। जो आउटसोर्सिंग को बढ़ावा देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़िया प्रतिभा को उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है। प्रशासन तथा उच्च शिक्षा विभाग को इस विषय पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।
छत्तीसगढ़ के मूल निवासी लाचार व्यव्यस्था का शिकार
वरिष्ठ अतिथि व्याख्याता डॉ गुलजार सिंह ठाकुर ने बताया कि एक ओर तो प्रदेश के डिग्री धारक अभ्यर्थी को जॉब देने की बात करते हैं लेकिन इतिहास विषय में ही प्रदेश के ही डिग्री धारी अभ्यर्थी को दरकिनार करते हुए, बाहरी अभ्यर्थियों को प्राथमिकता दिया गया।
जिसमें डॉ. गणेश कोशले इतिहास में उच्च योग्यता रखते हुए साथ ही छत्तीसगढ़ के मूल निवासी होते हुए भी इस लाचार व्यव्यस्था का शिकार हो गए है। अगर देखा जाय तो इस नियम ने बाहरी राज्य के लिए भंडारा खोल दिया और छत्तीसगढ़ के निवासियों को भुखमरी में डाल दिया।

