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UNESCO Recognises Ramcharit Manas Panchatantra: रामचरित मानस और पंचतंत्र को मिली UNESCO की मान्यता, 38 सदस्य और 40 ऑब्जर्वर देशों ने लिया फैसला

एमओडबल्यूसीएपी की 10वीं आम बैठक की मेजबानी मंगोलियाई सरकार के संस्कृति मंत्रालय, यूनेस्को के लिए मंगोलियाई राष्ट्रीय आयोग और यूनेस्को के बैंकॉक क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा की गई थी

एमओडबल्यूसीएपी की 10वीं आम बैठक की मेजबानी मंगोलियाई सरकार के संस्कृति मंत्रालय, यूनेस्को के लिए मंगोलियाई राष्ट्रीय आयोग और यूनेस्को के बैंकॉक क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा की गई थी

UNESCO Recognises Ramcharit Manas Panchatantra

नई दिल्ली। भारत में तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन को एशिया प्रशांत क्षेत्र के ‘यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ 2024 में जगह मिली है।

इस बार 20 वस्तुओं ‘यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में शामिल किया गया है। मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया पैसिफिक कमेटी अन्य श्रेणियों के अलावा, जीनोलॉजी, साहित्य और विज्ञान में एशिया-प्रशांत की उपलब्धियों को मान्यता देती है और उनको सम्मानित करती है।

रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन को शामिल करने का निर्णय, 7 और 8 मई को मंगोलिया की राजधानी, उलानबटार में आयोजित मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (एमओडबल्यूसीएपी) की 10वीं आम बैठक में लिया गया था।

एमओडबल्यूसीएपी की 10वीं आम बैठक की मेजबानी मंगोलियाई सरकार के संस्कृति मंत्रालय, यूनेस्को के लिए मंगोलियाई राष्ट्रीय आयोग और यूनेस्को के बैंकॉक क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा की गई थी।

बैठक में 40 पर्यवेक्षकों और नामांकित व्यक्तियों के साथ सदस्य देशों के 38 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

रामचरितमानस, पंचतंत्र, और सहृदयालोक-लोकन
रामचरितमानस को तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी में अवधी बोली में लिखा था। यह रामायण से भिन्न है जिसे ऋषि वाल्मिकी ने संस्कृत भाषा में लिखा था। रामचरितमानस चौपाई रूप में लिखा गया ग्रंथ है।

पंचतंत्र दुनिया की दंतकथाओं के सबसे पुराने संग्रहों में से एक है जो संस्कृत में लिखा गया था। विष्णु शर्मा जो महिलारोप्य के राजा अमर शक्ति के दरबारी विद्वान थे, उन्हें पंचतंत्र का श्रेय दिया जाता है।

इसकी रचना संभवतः 300 ईसा पूर्व के आसपास हुई थी। इसका अनुवाद 550 ईसा पूर्व में पहलवी (ईरानी भाषा) में किया गया था।

‘सहृदयालोक-लोकन’ की रचना आचार्य आनंदवर्धन ने संस्कृत में की थी। आचार्य आनंदवर्धन,10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 11वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के दौरान कश्मीर में रहते थे।

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